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सुप्रीम कोर्ट में आज अयोध्या मामले की सुनवाई 60 सेकंड से भी कम समय में हुई खत्म। | Aapki Chopal

सुप्रीम कोर्ट में आज अयोध्या मामले की सुनवाई 60 सेकंड से भी कम समय में हुई खत्म।

सुप्रीम कोर्ट में आज अयोध्या मामले की सुनवाई 60 सेकंड से भी कम समय में हुई खत्म।

रामजन्म भूमि और बाबरी मस्जिद भूमि विवाद में दायर याचिकाओं पर अब सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) द्वारा गठित 3 जजों की नई बेंच ही सुनवाई करेगी, सुप्रीम कोर्ट ने आज शुक्रवार को स्पष्ट शब्दों में कहा कि तीन जजों की बेंच  10 जनवरी से पहले तैयार हो जाएगी,सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अयोध्या मामला अब 10 जनवरी को नए बेंच के सामने होगा और वही बेंच तय करेगी कि इस मामले की आगे कब सुनवाई हो, इसके साथ ही कोर्ट में उस पीआईएल पर भी सुनवाई होनी थी, जिसमें मामले में देरी पर सवाल उठाया गया है हालांकि अब राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट में 10 जनवरी को नए सिरे से सुनवाई होगी जिसमें मामले की आगे की रूपरेखा तय होगी।

अयोध्या मामले पर अब जिस नए बेंच का गठन होगा वही इस केस की सुनवाई करेगा ,चीफ जस्टिस ने कहा कि दस जनवरी को उचित बेंच ही आगे के आदेश जारी करेगा, यहां उचित बेंच मतलब कोई तीन जज की बेंच से है,चीफ जस्टिस दस जनवरी से पहले बेंच का गठन करेंगे और यह 10 जनवरी को ही नई बेंच तय करेगी कि आगे सुनवाई कब हो।

आपको बता दें की सुप्रीम कोर्ट में आज 60 सेकंड से भी कम में अयोध्या मामले की सुनवाई खत्म हो गई,इस दौरान चीफ जस्टिस ने पूछा कि ये रामजन्म भूमि केस है?वकीलों के कुछ भी कहने से पहले ही चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि गठित होने वाली उचित बेंच ही 10 जनवरी को आगे के आदेश जारी करेगी,साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें अयोध्या मामले की त्वरित तथा रोज़ाना सुनवाई की मांग की गई थी,जनहित याचिका वकील हरीनाथ राम ने नवंबर, 2018 में दाखिल की थी।

 

  • हिन्दू महासभा के वकील का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट 10 जनवरी इस मामले की सुनवाई करेगी और उसी वक्त यह तय किया जाएगा कि कौन सी बेंच इस मामले की सुनवाई करेगी,कोर्ट इसके लिए एक रेग्युलर बेंच का गठन करेगा।
  • वही बाबरी मस्जिद के पक्षकार इकबाल अंसारी ने कहा कि पीएम मोदी का कोर्ट की प्रक्रिया पूरी होने से पहले अध्यादेश न लाने का फैसला पूरी तरह सही है,हमें कोर्ट के फैसले का इंतजार करना चाहिए। 
  • वहीं दूसरी ओर महंत राजू दास का कहना है कि तारीख पर तारीख देना हिन्दुओं की भावनाओं से खिलवाड़ है,अब तक राजनीतिक पार्टियां इस मुद्दे पर जनता से छलावा कर रहीं थी लेकिन अब कोर्ट भी ऐसा ही कर रहा है। 
  • महंत परमहंस दास का कहना है कि मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले को लेकर गंभीर हो गया है,10 जनवरी से वह इस पर अच्छी तरह से सुनवाई करेंगे,अगर ऐसा नहीं होता है तो अंतर्कलह हो सकता है।
  • हिन्दू महासभा के नंदकिशोर मिश्रा का कहना है कि कछुए की चाल से चल रही इस सुनवाई के लिए अब हम लोग ज्यादा देर इंतजार नहीं करेंगे। 
  • 10 जनवरी से होने वाली सुनवाई पर इकबाल अंसारी ने कहा कि कोर्ट जो भी काम कर रहा है हम उससे सहमत हैं और कोर्ट जो भी फैसला करेगा हम उसे मानेंगे।

आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट की पीठ अयोध्या विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2010 के फैसले के खिलाफ दायर 13 अपीलों पर सुनवाई कर रहा है, हाईकोर्ट ने अपने फैसले में अयोध्या में 2.77 एकड़ के इस विवादित स्थल को इस विवाद के तीनों पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला के बीच बांटने का आदेश दिया था। इस मामले में पिछले साल नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले में याचिकाओं पर शीघ्र सुनवाई से इनकार कर दिया था,उस दौरान चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की पीठ ने कहा था कि उसने पहले ही अपीलों को जनवरी में उचित पीठ के पास सूचीबद्ध कर दिया है,अखिल भारतीय हिंदू महासभा की ओर से उपस्थित अधिवक्ता बरुण कुमार के मामले पर शीघ्र सुनवाई करने के अनुरोध को खारिज करते हुए पीठ ने कहा था कि हमने आदेश पहले ही दे दिया है,अपील पर जनवरी में सुनवाई होगी,चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा था कि अदालत की अपनी प्राथमिकताएं हैं,उचित पीठ ही जनवरी में तय करेगी कि इसकी सुनवाई जनवरी, फरवरी में हो या उसके बाद,ध्यान हो कि इससे पहले पिछले साल 27 सितंबर को तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस अब्दुल नजीर की बेंच ने 2-1 के बहुमत से फैसला दिया था कि 1994 के संविधान पीठ के फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत नहीं है, जिसमें कहा गया था कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है। उस समय तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा और जस्टिस अशोक भूषण ने बहुमत के फैसले में मुस्लिम दलों में से एक के लिए पेश वरिष्ठ वकील राजीव धवन की दलीलों को ठुकरा दिया था,जिसमें उन्होंने कहा था कि 1994 के पांच जजों के संविधान पीठ के फैसले जिसमें ” मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है और नमाज कहीं भी पढ़ी जा सकती है, यहां तक की खुले में भी” की बात कही गई थी पर फिर से विचार करने की आवश्यकता है,जस्टिस अशोक भूषण ने फैसला पढ़ते हुए कहा था कि ये टिप्पणी सिर्फ अधिग्रहण को लेकर की गई थी,सभी धर्म, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च बराबर हैं. इस फैसले का असर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2010 में टाइटल के मुकदमे के फैसले पर नहीं पड़ा इसलिए इस पर फिर से विचार की जरूरत नहीं है। वही पीठ ने जमीनी विवाद मामले की सुनवाई 29 अक्तूबर से शुरू होने वाले हफ्ते से करने के निर्देश जारी किए थे, वहीं तीसरे जज एस जस्टिस अब्दुल नजीर इससे सहमत रहे,उन्होंने कहा कि 1994 के इस्माईल फारूखी फैसले पर पुनर्विचार की आवश्यकता है क्योंकि इस पर कई सवाल हैं, ये टिप्पणी बिना विस्तृत परीक्षण और धार्मिक किताबों के की गईं,उन्होंने कहा कि इसका असर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2010 के फैसले पर भी पड़ा था, इसलिए इस मामले को संविधान पीठ में भेजना चाहिए। बहराल अब 10 जनवरी को नई पीठ की अयोध्या मामले पर सुनवाई करेगी।

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